भाग १: जीन पियाजे (संज्ञानात्मक विकास)
१) वस्तु स्थायित्व (Object Permanence): संवेदी-गामक अवस्था (० ते २ वर्षे) के अंत तक बच्चा यह समझ जाता है कि वस्तुएं दिखाई न देने पर भी अस्तित्व में रहती हैं।
२) आत्मसातीकरण (Assimilation): जब कोई बच्चा अपने पुराने ज्ञान (Schema) में बिना किसी बदलाव के नई जानकारी जोड़ता है।
३) अहंकेन्द्रित (Egocentrism): पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (२ से ७ वर्ष) में बच्चा मानता है कि जैसा वह सोचता है, पूरी दुनिया भी वैसा ही सोचती है।
४) प्रतीकात्मक खेल (Symbolic Play): बच्चा लकड़ी की छड़ी को घोड़ा मानकर खेलता है। यह पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था की विशेषता है।
५) सक्रिय अन्वेषक (Little Scientists): पियाजे का मानना था कि बच्चे ज्ञान के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि सक्रिय निर्माता हैं।
६) स्कीमा (Schema): हमारे दिमाग में सूचनाओं को व्यवस्थित करने की एक संरचना या मानसिक पॉकेट।
७) उत्क्रमणीयता (Reversibility): मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (७ से ११ वर्ष) में बच्चा यह समझ जाता है कि मिट्टी के गोले से सांप बनाया जा सकता है और सांप से वापस गोला।
८) चार चरण: पियाजे ने विकास के चार चरण दिए हैं: संवेदी-गामक, पूर्व-संक्रियात्मक, मूर्त संक्रियात्मक और औपचारिक संक्रियात्मक।
९) अमूर्त तर्क (Abstract Reasoning): औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (११ वर्ष से आगे) में बच्चा अमूर्त और काल्पनिक स्थितियों पर तर्क कर सकता है।
१०) प्रकार और मात्रा: पियाजे के अनुसार बच्चों के सोचने का तरीका बड़ों से अलग होता है, लेकिन उनकी मानसिक क्षमता या मात्रा में अंतर नहीं होता।
भाग २: लेव वायगोत्स्की (सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत)
१) ZPD (Zone of Proximal Development): उस कार्य की सीमा जिसे बच्चा अकेले नहीं कर सकता, लेकिन किसी कुशल व्यक्ति की मदद से कर सकता है।
२) पाड़ या ढांचा (Scaffolding): सीखने के दौरान दी जाने वाली अस्थायी सहायता, जैसे साइकिल सीखते समय पीछे से पकड़ना।
३) सामाजिक अंतःक्रिया: वायगोत्स्की का मानना था कि विकास पहले समाज में होता है और फिर व्यक्ति के भीतर।
४) निजी वाक् (Private Speech): बच्चा खुद से बात करके अपने कार्यों की योजना बनाता है और स्वयं को निर्देशित करता है।
५) भाषा: वायगोत्स्की के अनुसार भाषा संज्ञानात्मक विकास का सबसे शक्तिशाली सांस्कृतिक उपकरण है।
६) MKO (More Knowledgeable Other): कोई भी व्यक्ति जिसके पास सीखने वाले से अधिक कौशल या ज्ञान हो।
७) सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण: यह सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि समाज और संस्कृति बच्चे के विकास को आकार देते हैं।
८) सहयोगात्मक अधिगम: समूहों में चर्चा और समस्याओं को सुलझाना वायगोत्स्की के सिद्धांतों का कक्षा में अनुप्रयोग है।
९) स्वतंत्र शुरुआत: शुरू में भाषा और विचार अलग-अलग होते हैं, लगभग ३ वर्ष की उम्र में वे आपस में मिल जाते हैं।
१०) खेल की भूमिका: खेल बच्चे को उसके वर्तमान स्तर से ऊपर उठने और ZPD बनाने में मदद करता है।
भाग ३: लॉरेंस कोहलबर्ग (नैतिक विकास)
१) तीन स्तर: पूर्व-पारंपरिक, पारंपरिक और उत्तर-पारंपरिक।
२) हिंज की दुविधा: नैतिकता मापने के लिए कहानियों का उपयोग किया गया, जिसमें हिंज की कहानी सबसे प्रसिद्ध है।
३) अच्छा लड़का या अच्छी लड़की: पारंपरिक स्तर में बच्चा दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए नैतिक व्यवहार करता है।
४) दंड और आज्ञाकारिता: पूर्व-पारंपरिक स्तर में बच्चा नियम इसलिए मानता है ताकि उसे सजा न मिले।
५) जैसे को तैसा (Tit for Tat): बच्चा सोचता है कि अगर तुम मुझे कुछ दोगे तो मैं भी तुम्हें कुछ दूँगा।
६) सामाजिक अनुबंध: उत्तर-पारंपरिक स्तर में व्यक्ति मानता है कि नियम लोगों के भले के लिए हैं और जरूरत पड़ने पर बदले जा सकते हैं।
७) लैंगिक पूर्वाग्रह: कैरोल गिलीगन के अनुसार कोहलबर्ग का सिद्धांत न्याय पर केंद्रित है और देखभाल की नैतिकता को कम महत्व देता है।
८) संज्ञानात्मक विकास: नैतिकता का विकास सीधे बच्चे की सोचने और समझने की क्षमता पर निर्भर करता है।
९) सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत: सर्वोच्च चरण जहाँ व्यक्ति अपनी अंतरात्मा और मानवता के आधार पर निर्णय लेता है।
१०) कानून और व्यवस्था: यहाँ व्यक्ति मानता है कि समाज में शांति बनाए रखने के लिए नियमों का पालन आवश्यक है।
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